शनिवार, 19 दिसंबर 2009

सिरफिरे फकीरों की सख्त जरूरत है इस दुनिया को, क्या आप बनोगे

बहुत पुरानी बात है, कितनी पुरानी?
तो जनाब बात उतनी पुरानी है, कि उस समय सृष्टि का सृजन लगभग शुरू हुआ ही था सृष्टि रचयिता, ब्रह्मा जी ने अपना प्रोजेक्ट बस यूँ मानो की शुरू किया ही था यानी यकीनन बेहद पुराने समय की बात है
सुनो जी ,

एक फकीर था, बिलकुल मेरे जैसा, हाँ जी, बिलकुल, निश्चित रूप से वो फकीर मेरे जैसा सिरफिरा ही रहा होगा तो जनाब बात ऎसी है कि वो सिरफिरा फकीर एक बार इधर-उधर यूँ ही बेमतलब भ्रमण कर रहा था अपनी आज की पृथ्वी (धरती) के आसपास ही कहीं भ्रमण कर रहा होगा कि अचानक ही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी की नजर उस पर पड़ गयी ब्रह्मा जी फकीर के पास दौड़े ब्रह्मा जी ने उस फटे हाल फकीर को एक बहुत बड़ा जोरदार चमकने वाला हीरा दिया फकीर ने कहा ये मेरे किसी काम का नहीं है, मुझे नहीं चाहिए ब्रह्मा जी ने फकीर से निवेदन किया कि आप ठीक कहते है, ये हीरा भले ही आपके काम का न हो परन्तु इसका सबसे सुरक्षित व उचित उपयोग आप ही कर सकते है मेरी दृष्टि में इतने मूल्यवान हीरे के लिए आप ही सर्वश्रेष्ट पात्र हैं, कृपया आप इसे स्वीकार करे ब्रह्मा जी के जोर देने पर फकीर ने हीरा ले लिया हीरा लेकर अलमस्त फकीर यूं ही इधर-उधर मत पूछो किधर-किधर घुमने फिरने निकल पड़ा

देवताओं को अपने सूचना तंत्र से जब यह बात पता लगी तो देवराज इन्द्र को बड़ी नागवार गुजरी यार इतने फटे हाल सिरफिरे फकीर को इतना बड़ा चमकदार हीरा दे दिया और मुझसे पूछा तक नहीं सो ईर्ष्या से जला-भुना इन्द्र जोर से दौड़ लगाकर फकीर के पास पंहुचा और धमकाया, अरे ओ रे फकीर, ला वो हीरा मेरे को दे इतना कीमती हीरा तेरे किस काम का फकीर ने जीभ निकालकर इन्द्र को चिढाया, न सही मेरे किसी काम का BUT तेरे को तो नहीं दूंगा इन्द्र बोला, वज्र (इन्द्र का शस्त्र) से मरेगा क्या फकीर बोला चाहे मार दे BUT तेरे को तो नहीं ही दूँगा
इन्द्र ने वज्र लहराया, फकीर ने अपनी पूरी पूरी ताकत का उपयोग करके उस हीरे को खुले अन्तरिक्ष में जोर से उछाल दिया इन्द्र बोला अबे सिरफिरे तूने ये क्या किया? फकीर बोला तेरी तो ऐसी कि तैसी, मैंने तो उछाल दिया अब चाहे मार ले, चला वज्र
मुंह लटकाकर इन्द्र चलता हुआ बोला, तेरे जैसे को मारकर मैं कर भी क्या लूंगा

तो जनाब प्रातः कालीन बेला में पूर्व दिशा के आकाश में आप भी उस चमकते हीरे को देख सकते हैं जरा उस हीरे से आन्खिएन तो लड़ाओ, अपनी औकात समझ में आ जाएगी

4 टिप्‍पणियां:

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

आपका कहना है कि ये कथा उस समय की है जब कि ब्रह्मा जी ने सृ्ष्टि निर्माण का अपना प्रोजेक्ट बस यूँ मानो की शुरू किया ही था...लेकिन हमने तो सुना है कि ब्रह्मा द्वारा सबसे आखिर में अपनी नायाब कृ्ति(?) इन्सान की ही रचना की गई थी..क्यों कि मनुष्य की रचना के बाद तो वो किसी चीज के निर्माण के लायक रह ही नहीं गए थे :-)

AlbelaKhatri.com ने कहा…

बहुत अच्छा लगा .............

मज़ा आया

Akshita (Pakhi) ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा आपने...
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'पाखी की दुनिया' में 'लाल-लाल तुम बन जाओगे...'

ZEAL ने कहा…

...न सही मेरे किसी काम का BUT तेरे को तो नहीं दूंगा...

I am loving the use of ' BUT '.

Nice post !